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वन पर्व
अध्याय १९०
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मार्कण्डेय़ उवाच
श्रुत्वा वचः स मुनी राजपुत्र्या; स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर |  ८२   क
ततः स राजा मुदितो वभूव; वाम्यौ चास्मै सम्प्रददौ प्रणम्य ||  ८२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति