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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
कर्णस्त्वेको मय़ा सार्धं निहनिष्यति पाण्डवान् |  २६   क
ततो नृपतय़ो वीराः स्थास्यन्ति मम शासने ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति