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शान्ति पर्व
अध्याय १९१
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युधिष्ठिर उवाच
कीदृशो जापको याति निरय़ं वर्णय़स्व मे |  १   क
कौतूहलं हि मे जातं तद्भवान्वक्तुमर्हति ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति