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उद्योग पर्व
अध्याय १४०
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सञ्जय़ उवाच
न सज्जते शैलवनस्पतिभ्य; ऊर्ध्वं तिर्यग्योजनमात्ररूपः |  ५   क
श्रीमान्ध्वजः कर्ण धनञ्जय़स्य; समुच्छ्रितः पावकतुल्यरूपः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति