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शल्य पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽपरैस्त्रिभिर्वाणैर्द्रौणिं विव्याध पाण्डवः |  ३३   क
सोऽतिविद्धो वलवता पार्थेन सुमहावलः |  ३३   ख
न सम्भ्रान्तस्तदा द्रौणिः पौरुषे स्वे व्यवस्थितः ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति