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वन पर्व
अध्याय १९१
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वैशम्पाय़न उवाच
स मां प्राकारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संसिद्धो यथोचितं स्थानं प्रतिपन्नः ||  २५   क
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति