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वन पर्व
अध्याय १९१
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वैशम्पाय़न उवाच
शोभनं कृतं भवता राजानमिन्द्रद्युम्नं स्वर्गलोकाच्च्युतं स्वे स्थाने स्वर्गे पुनः प्रतिपादय़तेति ||  २७   क
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति