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सभा पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
अनेकाग्रं तु तं दृष्ट्वा शकुनिः प्रत्यभाषत |  १८   क
दुर्योधन कुतोमूलं निःश्वसन्निव गच्छसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति