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वन पर्व
अध्याय १५५
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वैशम्पाय़न उवाच
विमलस्फटिकाभानि पाण्डुरच्छदनैर्द्विजैः |  ६६   क
राजहंसैरुपेतानि सारसाभिरुतानि च |  ६६   ख
सरांसि सरितः पार्थाः पश्यन्तः शैलसानुषु ||  ६६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति