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आदि पर्व
अध्याय १९२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः प्रीतमनाः क्षत्ता धृतराष्ट्रं विशां पते |  १७   क
उवाच दिष्ट्या कुरवो वर्धन्त इति विस्मितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति