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आदि पर्व
अध्याय १९२
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वैशम्पाय़न उवाच
सपत्नवृद्धिं यत्तात मन्यसे वृद्धिमात्मनः |  २७   क
अभिष्टौषि च यत्क्षत्तुः समीपे द्विपदां वर ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति