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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
मत्स्याञ्जित्वाजय़च्चेदीन्कारूषान्केकय़ानपि |  २३   क
पाञ्चालान्सृञ्जय़ान्पाण्डून्भारद्वाजः पुनः पुनः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति