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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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राजो उवाच
प्रस्तुतं सुमहत्कार्यमावय़ोर्गह्वरं यथा |  १०५   क
जापकस्य दृढीकारः कथमेतद्भविष्यति ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति