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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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राजो उवाच
यदि तावन्न गृह्णामि व्राह्मणेनापवर्जितम् |  १०६   क
कथं न लिप्येय़महं दोषेण महताद्य वै ||  १०६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति