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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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विरूप उवाच
सर्वमन्योन्यनिकषे निघृष्टं पश्यतस्तव |  ११६   क
गच्छ लोकाञ्जितान्स्वेन कर्मणा यत्र वाञ्छसि ||  ११६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति