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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
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व्राह्मण उवाच
मय़ि प्रलीने प्रलय़ं व्रजन्ति; सर्वे प्राणाः प्राणभृतां शरीरे |  १७   क
मय़ि प्रचीर्णे च पुनश्चरन्ति; श्रेष्ठो ह्यहं पश्यत मां प्रलीनम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति