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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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धर्म उवाच
द्विजाते पश्य मां धर्ममहं त्वां द्रष्टुमागतः |  १९   क
जप्यस्य च फलं यत्ते सम्प्राप्तं तच्च मे शृणु ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति