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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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धर्म उवाच
प्राणत्यागं कुरु मुने गच्छ लोकान्यथेप्सितान् |  २१   क
त्यक्त्वात्मनः शरीरं च ततो लोकानवाप्स्यसि ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति