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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
कृतं लोकैर्हि मे धर्म गच्छ च त्वं यथासुखम् |  २२   क
वहुदुःखसुखं देहं नोत्सृजेय़महं विभो ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति