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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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धर्म उवाच
अवश्यं भोः शरीरं ते त्यक्तव्यं मुनिपुङ्गव |  २३   क
स्वर्ग आरोह्यतां विप्र किं वा ते रोचतेऽनघ ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति