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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
शूरा गर्जन्ति सततं प्रावृषीव वलाहकाः |  २५   क
फलं चाशु प्रय़च्छन्ति वीजमुप्तमृताविव ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति