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अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
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भीष्म उवाच
तथा मत्स्यैः परिवृतं च्यवनं भृगुनन्दनम् |  १८   क
आकर्षन्त महाराज जालेनाथ यदृच्छय़ा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति