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अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
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भीष्म उवाच
फलं देवर्षिचरितं विपुलं समुपाश्नुते |  ११२   क
भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामलः ||  ११२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति