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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
न युक्तं तु मृषा वाणी त्वय़ा वक्तुमरिन्दम |  ५७   क
तथा मय़ाप्यभ्यधिकं मृषा वक्तुं न शक्यते ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति