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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
शून्येय़ं च मही सर्वा न मे प्रीतिकरी शुभे |  ३१   क
वान्धवा नः परिक्षीणा वलं नो न यथा पुरा ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति