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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
यदि जप्यफलं दत्तं मय़ा नेषिष्यसे नृप |  ७१   क
स्वधर्मेभ्यः परिभ्रष्टो लोकाननुचरिष्यसि ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति