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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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विरूप उवाच
धारय़ामि नरव्याघ्र विकृतस्येह गोः फलम् |  ८७   क
ददतश्च न गृह्णाति विकृतो मे महीपते ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति