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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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राजो उवाच
दीय़मानं न गृह्णासि ऋणं कस्मात्त्वमद्य वै |  ९८   क
यथैव तेऽभ्यनुज्ञातं तथा गृह्णीष्व माचिरम् ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति