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वन पर्व
अध्याय १९२
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मार्कण्डेय़ उवाच
इन्द्रसोमाग्निवरुणा देवासुरमहोरगाः |  १४   क
प्रह्वास्त्वामुपतिष्ठन्ति स्तुवन्तो विविधैः स्तवैः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति