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वन पर्व
अध्याय १९२
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मार्कण्डेय़ उवाच
त्वय़ि तुष्टे जगत्स्वस्थं त्वय़ि क्रुद्धे महद्भय़म् |  १६   क
भय़ानामपनेतासि त्वमेकः पुरुषोत्तम ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति