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वन पर्व
अध्याय १९२
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मार्कण्डेय़ उवाच
देवानां मानुषाणां च सर्वभूतसुखावहः |  १७   क
त्रिभिर्विक्रमणैर्देव त्रय़ो लोकास्त्वय़ाहृताः |  १७   ख
असुराणां समृद्धानां विनाशश्च त्वय़ा कृतः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति