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वन पर्व
अध्याय १९२
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वैशम्पाय़न उवाच
विदितास्तव धर्मज्ञ देवदानवराक्षसाः |  २   क
राजवंशाश्च विविधा ऋषिवंशाश्च शाश्वताः |  २   ख
न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदस्मिँल्लोके द्विजोत्तम ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति