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वन पर्व
अध्याय १९२
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं स्तुतो हृषीकेश उत्तङ्केन महात्मना |  २०   क
उत्तङ्कमव्रवीद्विष्णुः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति