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वन पर्व
अध्याय १९२
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उत्तङ्क उवाच
पर्याप्तो मे वरो ह्येष यदहं दृष्टवान्हरिम् |  २१   क
पुरुषं शाश्वतं दिव्यं स्रष्टारं जगतः प्रभुम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति