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वन पर्व
अध्याय १९२
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विष्णुरु उवाच
प्रीतस्तेऽहमलौल्येन भक्त्या च द्विजसत्तम |  २२   क
अवश्यं हि त्वय़ा व्रह्मन्मत्तो ग्राह्यो वरो द्विज ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति