वन पर्व  अध्याय १९२

विष्णुरु उवाच

यदि मे भगवान्प्रीतः पुण्डरीकनिभेक्षणः |  २४   क
धर्मे सत्ये दमे चैव वुद्धिर्भवतु मे सदा |  २४   ख
अभ्यासश्च भवेद्भक्त्या त्वय़ि नित्यं महेश्वर ||  २४   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति