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वन पर्व
अध्याय १५२
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राक्षसा ऊचुः
देवर्षय़स्तथा यक्षा देवाश्चात्र वृकोदर |  ५   क
आमन्त्र्य यक्षप्रवरं पिवन्ति विहरन्ति च |  ५   ख
गन्धर्वाप्सरसश्चैव विहरन्त्यत्र पाण्डव ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति