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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ९
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वैशम्पाय़न उवाच
सुसंवृतं मन्त्रगृहं स्थलं चारुह्य मन्त्रय़ेः |  २२   क
अरण्ये निःशलाके वा न च रात्रौ कथञ्चन ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति