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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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व्रह्मो उवाच
वैजय़न्तो गिरिवरः सततं सेव्यते मय़ा |  २१   क
अत्रैकाग्रेण मनसा पुरुषश्चिन्त्यते विराट् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति