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अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
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अङ्गिरा उवाच
नानपत्यो भवेत्प्राज्ञो दरिद्रो वा कदाचन |  १५   क
यजिष्णुः पञ्चमीं षष्ठीं क्षपेद्यो भोजय़ेद्द्विजान् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति