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वन पर्व
अध्याय १९३
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मार्कण्डेय़ उवाच
शशादस्य तु दाय़ादः ककुत्स्थो नाम वीर्यवान् |  २   क
अनेनाश्चापि काकुत्स्थः पृथुश्चानेनसः सुतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति