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वन पर्व
अध्याय १९३
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मार्कण्डेय़ उवाच
जज्ञे श्रावस्तको राजा श्रावस्ती येन निर्मिता |  ४   क
श्रावस्तस्य तु दाय़ादो वृहदश्वो महावलः |  ४   ख
वृहदश्वसुतश्चापि कुवलाश्व इति स्मृतः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति