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वन पर्व
अध्याय १९३
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मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्य पुत्राणां सहस्राण्येकविंशतिः |  ५   क
सर्वे विद्यासु निष्णाता वलवन्तो दुरासदाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति