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वन पर्व
अध्याय १९३
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मार्कण्डेय़ उवाच
कुवलाश्वस्तु पितृतो गुणैरभ्यधिकोऽभवत् |  ६   क
समय़े तं ततो राज्ये वृहदश्वोऽभ्यषेचय़त् |  ६   ख
कुवलाश्वं महाराज शूरमुत्तमधार्मिकम् ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति