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शान्ति पर्व
अध्याय ३०२
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जनक उवाच
अग्राह्यावृषिशार्दूल कथमेको ह्यचेतनः |  १४   क
चेतनावांस्तथा चैकः क्षेत्रज्ञ इति भाषितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति