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उद्योग पर्व
अध्याय १९३
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यक्ष उवाच
शप्तो वैश्रवणेनास्मि त्वत्कृते पार्थिवात्मज |  ५१   क
गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान्यथासुखम् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति