शान्ति पर्व  अध्याय २८७

पराशर उवाच

यथा मृणालोऽनुगतमाशु मुञ्चति कर्दमम् |  २०   क
तथात्मा पुरुषस्येह मनसा परिमुच्यते |  २०   ख
मनः प्रणय़तेऽऽत्मानं स एनमभिय़ुञ्जति ||  २०   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति