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आदि पर्व
अध्याय १९४
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कर्ण उवाच
विक्रमं च प्रशंसन्ति क्षत्रिय़स्य विशां पते |  १८   क
स्वको हि धर्मः शूराणां विक्रमः पार्थिवर्षभ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति