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आदि पर्व
अध्याय १९४
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कर्ण उवाच
आर्यवृत्तश्च पाञ्चाल्यो न स राजा धनप्रिय़ः |  ९   क
न सन्त्यक्ष्यति कौन्तेय़ान्राज्यदानैरपि ध्रुवम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति