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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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मनुरु उवाच
स्वेनात्मना चक्षुरिव प्रणेता; निशात्यये तमसा संवृतात्मा |  १३   क
ज्ञानं तु विज्ञानगुणेन युक्तं; कर्माशुभं पश्यति वर्जनीय़म् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति